चौसर का खेल
बहुत पहले पाँच वीर भाई थे, जिन्हें पांडव कहा जाता था। उनका चचेरा भाई दुर्योधन उनसे जलता था।
उसने उन्हें चौसर खेलने बुलाया। उसके मामा शकुनि उसकी ओर से खेले, और शकुनि ने धोखा दिया। पांडव सब कुछ हार गए, यहाँ तक कि अपना राज्य भी।
फिर एक कठिन शर्त रखी गई। उन्हें बारह साल जंगल में रहना था। तेरहवें साल उन्हें छिपकर रहना था। अगर किसी ने उन्हें पहचान लिया, तो सब फिर से शुरू करना पड़ता!
पेड़ का रहस्य
आख़िरी साल के लिए भाई राजा विराट के राज्य में गए। उन्होंने भेस बदला और महल के साधारण सेवक बनकर रहने लगे।
पर उनके प्रसिद्ध अस्त्र उनकी पहचान खोल सकते थे, ख़ासकर अर्जुन का शक्तिशाली धनुष गांडीव।
इसलिए वे नगर के बाहर एक पुराने शमी के पेड़ पर चढ़े। उन्होंने अस्त्रों को कसकर लपेटा और ऊँची डालियों में बाँध दिया। फिर लोगों से कहा कि यह अंतिम संस्कार के लिए लपेटा गया एक पुराना शव है। सब डर गए, और कोई उस पेड़ के पास नहीं गया!
महल पर संकट
साल लगभग पूरा होने वाला था। अचानक कौरव सेना ने राजा विराट के राज्य पर हमला किया और उनकी सारी गायें हाँक ले गई!
राजा दूसरे युद्ध में गए हुए थे। घर पर केवल उनका छोटा बेटा, राजकुमार उत्तर था। वह रथ पर चढ़ा और बोला, “मैं अकेले ही सबको हरा दूँगा!” नृत्य गुरु बृहन्नला ने उसका रथ चलाया।
पर सेना को देखते ही उत्तर के घुटने काँपने लगे। सामने भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन खड़े थे, देश के सबसे महान योद्धा। वह रथ से कूदकर भाग खड़ा हुआ!
बृहन्नला ने उसे पकड़ा और प्यार से कहा, “डरो मत। बस रथ को उस पुराने शमी के पेड़ तक ले चलो।”
धनुष नीचे आया
पेड़ के पास बृहन्नला ने कहा, “ऊपर चढ़ो और वह गठरी नीचे ले आओ।”
“पर वह तो शव है!” उत्तर चिल्लाया। “मैं राजकुमार हूँ। मैं उसे नहीं छू सकता!”
बृहन्नला ने हँसकर कहा, “वह शव नहीं है। मुझ पर भरोसा करो, ऊपर चढ़ो।”
तो उत्तर पेड़ पर चढ़ा और गठरी खोली। उसमें दुनिया के सबसे प्रसिद्ध अस्त्र थे। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
बृहन्नला ने मुस्कुराकर कहा, “मैं अर्जुन हूँ। तुम लगाम सँभालो। युद्ध मैं करूँगा।”
अर्जुन ने गांडीव उठाया और उसकी डोरी खींची। टंकार! वह आवाज़ बादलों की गड़गड़ाहट की तरह पूरे मैदान में गूँज गई। फिर उन्होंने अपना महान शंख देवदत्त बजाया।
दूर खड़े उनके गुरु द्रोण ने वह आवाज़ सुनी और तुरंत पहचान गए। “यह अर्जुन है!” उन्होंने कहा।

अर्जुन के पहले बाण किसी को चोट पहुँचाने के लिए नहीं थे। दो बाण धीरे से द्रोण के चरणों में गिरे, यह कहने के लिए, “गुरुदेव, प्रणाम।” दो और बाण द्रोण के कानों के पास से गुज़रे, उनका अभिवादन करने। फिर युद्ध शुरू हुआ।
एक धनुर्धर, पूरी सेना
एक-एक करके बड़े-बड़े योद्धा पीछे हटते गए। कर्ण भाग गया। कृपाचार्य, अश्वत्थामा और द्रोण भी अर्जुन को रोक नहीं पाए। महाबली भीष्म को भी मैदान छोड़ना पड़ा, और दुर्योधन अपना रथ मोड़कर भाग निकला!
फिर सबने एक साथ उन पर हमला किया। अर्जुन ने एक विशेष अस्त्र, सम्मोहन अस्त्र चलाया, और पूरी सेना गहरी नींद में सो गई! केवल ज्ञानी भीष्म इसका रहस्य जानते थे, और वे जागते रहे।
छोटी राजकुमारी ने बृहन्नला से अपनी गुड़ियों के लिए सुंदर कपड़े लाने को कहा था। इसलिए जब योद्धा सो रहे थे, उत्तर ने चुपचाप उनके रंग-बिरंगे दुपट्टे इकट्ठे कर लिए!
गायें सुरक्षित घर लौट आईं। दुर्योधन चिल्लाया कि पांडव समय से पहले पहचाने गए। पर भीष्म ने दिन गिने और कहा, “नहीं। तेरह साल पहले ही पूरे हो चुके हैं।” पांडवों ने अपना वचन निभाया था।
सच सामने आया
अर्जुन ने अस्त्र फिर से शमी के पेड़ में रख दिए और दोबारा बृहन्नला बन गए। उन्होंने सारी तारीफ़ भी उत्तर को ही लेने दी!
तीन दिन बाद पाँचों भाइयों ने राजा विराट को बताया कि वे असल में कौन हैं। राजा बहुत ख़ुश हुए। वे चाहते थे कि उनकी बेटी का विवाह अर्जुन से हो। पर अर्जुन उसके गुरु रह चुके थे, इसलिए उन्होंने कहा कि उसका विवाह उनके बेटे अभिमन्यु से हो।
मान्यता है कि अर्जुन ने विजयादशमी, यानी दशहरे के दिन, शमी के पेड़ से अपना धनुष वापस लिया था। इसीलिए आज भी कई परिवार दशहरे पर शमी के पेड़ की पूजा करते हैं और जीत व सौभाग्य के प्रतीक के रूप में उसकी पत्तियाँ बाँटते हैं।
सच और धैर्य को इंतज़ार करना पड़ सकता है, पर अंत में जीत उन्हीं की होती है।
स्रोत: महाभारत, विराट पर्व: अज्ञातवास का वर्ष और गो-ग्रहण की कथा।
